शपथ पत्र में छिपाया ‘जेल’ जाने का राज और दोहरी डिग्री, नव अधिवक्ता नीतीश वर्मा के खिलाफ बार कौंसिल पहुंची शिकायत, लाइसेंस रद्द करने की मांग

महराजगंज:जनपद के कोठीभार थाना क्षेत्र में एक अधिवक्ता द्वारा तथ्यों को छिपाकर और फर्जी शपथ पत्र के आधार पर वकालत का लाइसेंस हासिल करने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता लवकुश पाण्डेय ने ‘बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश’ में शिकायत कर आरोपी अधिवक्ता का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द करने और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम विसोखोर, पोस्ट- कटहरी खुर्द निवासी लवकुश पाण्डेय ने बार कौंसिल को भेजे गए अपने शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि अधिवक्ता नीतीश वर्मा (पुत्र संतोष वर्मा) ग्राम कटहरी खुर्द थाना कोठीभार जनपद महराजगंज ने अपना पंजीकरण कराते समय जानबूझकर अपने आपराधिक इतिहास को छिपाया है।केवल कुछ अपराधिक मुकदमों की सूची दी है।

शिकायत में दावा किया गया है कि आरोपी अधिवक्ता के खिलाफ 16 से अधिक गंभीर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं, जिनमें एससी/एसटी एक्ट, बलवा और घर में घुसकर मारपीट जैसी धाराएं शामिल हैं।

प्रमुख आरोप:

जेल जाने की बात छुपाई : शिकायतकर्ता लवकुश पाण्डेय ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि कोठीभार थाने में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 29/2020 धारा 147,323,504,506,352,452,427 आईपीसी में आरोपी की जमानत निचली अदालत से खारिज हुई थी और वह 9 दिन न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भी रहा था। आरोप है कि बार कौंसिल के शपथ पत्र में आरोपी ने इस तथ्य को छिपाकर अधिवक्ता अधिनियम की धारा 26 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 181/216 BNS का उल्लंघन किया है।

एक ही सत्र में दो डिग्रियां : मामले में एक और बड़ा खुलासा करते हुए शिकायतकर्ता ने बताया कि आरोपी ने एक ही शैक्षणिक सत्र में ‘स्नातक’ की नियमित डिग्री और ‘आई.टी.आई.’ (ITI) का रेगुलर कोर्स साथ-साथ किया है। यूजीसी और बार कौंसिल के नियमों के मुताबिक, एक ही समय में दो अलग-अलग संस्थानों में उपस्थित रहना असंभव है, जो सीधे तौर पर शैक्षणिक धोखाधड़ी को दर्शाता है।

आपराधिक पृष्ठभूमि: नामांकन के समय अपने ऊपर दर्ज 16 आपराधिक मामलों (वर्ष 2016-2025 के बीच) और परिवार (पिता/नाना/बहन) के आपराधिक इतिहास (क्रमशः 23 , 20 व 1 मामले) को छिपाना।केवल कुछ अपराधिक मुकदमों की सूची देना।

न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग: अपने परिवार के सदस्यों (माता, पिता, नाना, नानी, बहन) को वादी बनाकर व स्वयं वादी बनकर विरोधियों पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराना और वसूली का रैकेट चलाना।

शिकायतकर्ता का बयान:

“कानून के रक्षक को कानून का भक्षक नहीं होना चाहिए। आरोपी ने जेल जाने और एक ही सत्र में दो डिग्रियां को छिपाकर न केवल बार कौंसिल को गुमराह किया है, बल्कि समाज के साथ भी धोखा किया है। हमने बार कौंसिल से मांग की है कि ऐसे व्यक्ति का लाइसेंस तुरंत रद्द किया जाए और उनके खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज हो।”

— लवकुश पाण्डेय (शिकायतकर्ता)

विधिक आधार:

शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले ‘सतीश कुमार शर्मा बनाम बार कौंसिल ऑफ हिमाचल प्रदेश‘ का उल्लेख किया गया है, जो स्पष्ट करता है कि तथ्यों को छिपाकर प्राप्त किया गया नामांकन (प्रारंभ से ही शून्य) माना जाएगा।

आगे की कार्यवाही:

अब सबकी निगाहें बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की अनुशासन समिति पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो आरोपी अधिवक्ता का लाइसेंस रद्द होना और उनके खिलाफ विधिक कार्यवाही होना तय माना जा रहा है।

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