भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण के दावों के बीच एक पुरानी लेकिन जानलेवा समस्या ने फिर से तूल पकड़ लिया है। उत्तर प्रदेश के जनपद महाराजगंज के अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता विनय कुमार पांडेय ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री को पत्र लिखकर एक ऐसी ‘साइलेंट किलर’ समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जो हर साल हजारों मरीजों की जान जोखिम में डालती है— डॉक्टरों की अस्पष्ट लिखावट।
✍️ ‘डॉक्टर की हैंडराइटिंग’ या मौत का बुलावा?
अक्सर मजाक में कहा जाने वाला ‘डॉक्टर की लिखावट’ का मुद्दा अब मजाक नहीं रहा। विनय कुमार पांडेय ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि हाथ से लिखे गए अस्पष्ट पर्चों के कारण मेडिकल स्टोर संचालक अक्सर दवाओं के नाम पढ़ने में चूक कर देते हैं। एक छोटी सी वर्णमाला की गलती मरीज को गलत दवा या गलत खुराक (Dose) की ओर ले जाती है, जो कई बार जानलेवा साबित होती है।
🔍 रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- मेडिकल एरर (Medication Errors): अस्पष्ट पर्चों के कारण होने वाली गलतियाँ चिकित्सा जगत में एक अदृश्य महामारी की तरह हैं।
- NMC के नियमों की अनदेखी: हालांकि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने पूर्व में डॉक्टरों को ‘कैपिटल लेटर्स’ (बड़े अक्षरों) में पर्चे लिखने के निर्देश दिए थे, लेकिन धरातल पर डॉक्टर आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं।
- डिजिटल इंडिया बनाम स्वास्थ्य तंत्र: जब देश के गांवों तक में डिजिटल भुगतान पहुंच गया है, तो अस्पतालों में ‘प्रिंटेड प्रिस्क्रिप्शन’ का अनिवार्य न होना एक बड़ी नीतिगत विफलता मानी जा रही है।
📢 सामाजिक कार्यकर्ता की मांगें
अधिवक्ता विनय पांडेय ने सरकार से तीन प्रमुख कदम उठाने की मांग की है:
- अनिवार्यता: सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में ‘प्रिंटेड प्रिस्क्रिप्शन’ को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए।
- ई-प्रिस्क्रिप्शन: एक केंद्रीय डिजिटल प्रणाली विकसित हो जिससे मरीज का मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे।
- दंडात्मक कार्रवाई: नियमों का उल्लंघन करने वाले क्लीनिकों और डॉक्टरों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
💡 क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन’ न केवल मानवीय चूक को कम करेगा, बल्कि इससे फार्मेसी और डॉक्टर के बीच एक पारदर्शी कड़ी भी स्थापित होगी। विकसित देशों में यह प्रणाली दशकों से लागू है, जिससे वहां मेडिकल एरर की दर में भारी कमी आई है।
निष्कर्ष:
महाराजगंज से उठी यह आवाज अब देश के नीति-निर्माताओं के गलियारों तक पहुँच चुकी है। अब देखना यह है कि क्या स्वास्थ्य मंत्रालय इस ‘हैंडराइटिंग’ के संकट को गंभीरता से लेते हुए देश को ‘डिजिटल और स्पष्ट’ स्वास्थ्य सेवाओं की ओर ले जाता है या नहीं।
