भूमि अधिग्रहण मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख

हेडलाइन: ‘ज़मीन सबकी कीमती, फिर मुआवजे में भेदभाव क्यों?’ – सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे एक्ट के तहत मुआवजे की विसंगतियों पर जताई चिंता

मुख्य बिंदु:

  • ​सुप्रीम कोर्ट ने 1956 के अधिनियम और 2013 के कानून के बीच मुआवजे के अंतर पर सवाल उठाए।
  • ​केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल को कानूनी ढांचे पर पुनर्विचार करने का सुझाव।
  • ​अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार और समानता पर ज़ोर।

​पूरी खबर

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और उसके बदले मिलने वाले मुआवजे में व्याप्त ‘असमानता’ पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम (National Highways Act), 1956 के तहत ज़मीन गंवाने वाले किसानों और भू-स्वामियों को मिलने वाले लाभ, 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून की तुलना में काफी कम हैं।

​क्या है पूरा मामला?

​अदालत 21 भू-स्वामियों की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनकी ज़मीन राजमार्ग निर्माण के लिए ली गई थी। कोर्ट ने पाया कि वर्तमान व्यवस्था में दो अलग-अलग कानूनों के तहत अधिग्रहण होने पर मुआवजे के आकलन में “स्पष्ट विसंगति” (Clear Disparity) दिखाई देती है।

​अदालत ने कहा, “बिना किसी ठोस तर्क (Intelligible Differentia) के ज़मीन मालिकों को दो अलग-अलग वर्गों में बांट दिया गया है, जिससे उन लोगों में असंतोष पैदा होता है जिन्हें कम मुआवजा मिलता है।”

​न्यायिक अनुभव की कमी पर सवाल

​सुनवाई के दौरान एक और अहम मुद्दा उठा। 1956 के अधिनियम के तहत मुआवजे का निर्धारण अक्सर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों (जैसे कलेक्टर) द्वारा किया जाता है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि इन अधिकारियों के पास अक्सर बाज़ार मूल्य तय करने और जटिल वैधानिक लाभों का आकलन करने के लिए आवश्यक ‘न्यायिक अनुभव’ नहीं होता है। इसके विपरीत, अन्य कानूनों के तहत यह अधिकार अदालतों के पास है, जहाँ अपील की भी व्यापक गुंजाइश होती है।

​सरकार को सुझाव

​अदालत ने भारत के अटॉर्नी जनरल और केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने का सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

  1. ​सरकार को विधायी ढांचे को फिर से परखना चाहिए।
  2. ​संविधान के अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) के अनुरूप बाज़ार मूल्य के निर्धारण में समानता लाई जानी चाहिए।
  3. ​अधिग्रहण की गति तेज़ रखने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि किसानों को उनके हक से वंचित न किया जाए।

अगली सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की प्रति अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को भेजने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को तय की गई है। तब तक पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक जारी रहेगी जिसने पुराने कानून के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक बताया था।

रिपोर्टिंग: लीगल डेस्क

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