इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए “आपसी सहमति से विवाह करने वाले जोड़ों का पीछा करने” को एक ‘परेशान करने वाला चलन’ करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस का काम अपराधों को रोकना है, न कि बालिग जोड़ों की निजी जिंदगी में दखल देना।
”व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर हमला”
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक युवा विवाहित जोड़े द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामले के अनुसार, युवती के पिता ने युवक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। अदालत ने इस कार्रवाई को “याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एक गंभीर हमला” बताया।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
- संवैधानिक संस्कृति का सम्मान: कोर्ट ने कहा कि अब पूरे देश और हर नागरिक तक यह संदेश जाना चाहिए कि बालिग होने की उम्र और देश की संवैधानिक संस्कृति का सम्मान किया जाना अनिवार्य है।
- पुलिस का गलत प्राथमिकता निर्धारण: बेंच ने चिंता जताई कि पुलिस अन्य गंभीर अपराधों की जांच करने के बजाय उन शादियों की जांच करने में ऊर्जा बर्बाद कर रही है जो आपसी सहमति से हुई हैं।
- पसंद का अधिकार: अदालत ने जोर देकर कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को यह बताने का अधिकार किसी के पास नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपनी जिंदगी कैसे बिताएगा।
DGP को सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को इस मामले में हस्तक्षेप करने और पुलिस बल के इस ‘परेशान करने वाले व्यवहार’ को रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है। अदालत ने नाराजगी जाहिर की कि महज ‘लापता व्यक्ति’ की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जोड़े को परेशान नहीं करना चाहिए था।
क्या था पूरा मामला?
एक बालिग जोड़े ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था क्योंकि युवती के परिजनों के विरोध के कारण पुलिस उनका पीछा कर रही थी। युवती ने कोर्ट में स्पष्ट बयान दिया कि उसने अपनी मर्जी से विवाह किया है और वह अपने पति के साथ ही रहना चाहती है। विवाह का प्रमाण पत्र वैध पाए जाने के बाद कोर्ट ने पुलिसिया कार्रवाई को अनुचित ठहराया।
