विशेष संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी अदालत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की याचिका खारिज करते समय आरोपी को ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश नहीं दे सकती। शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा कि अदालतों के पास इस तरह का आदेश देने का कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है।
”सरेंडर का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर”
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी और उसे निर्देश दिया था कि वह निचली अदालत में सरेंडर करे और वहां से नियमित जमानत (Regular Bail) की मांग करे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “यदि कोर्ट अग्रिम जमानत याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है। लेकिन कोर्ट के पास यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर कर देना चाहिए।”
हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी
अदालत ने विशेष रूप से बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में अग्रिम जमानत याचिकाओं की बढ़ती संख्या और उन पर आने वाले आदेशों पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर’ के आदेशों के कारण मुकदमेबाजी बढ़ती है और याचिकाकर्ताओं को बेवजह सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
पुलिस की गिरफ्तारी की शक्तियों पर स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जब कोई मजिस्ट्रेट किसी शिकायत का संज्ञान लेता है और प्रक्रिया शुरू करता है, तो सामान्यतः समन जारी किया जाता है। सीआरपीसी (CrPC) की धारा 87 के तहत वारंट केवल विशेष परिस्थितियों में ही जारी किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी शिकायत वाले मामले (Complaint Case) में पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने का तब तक कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोर्ट द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो।
