जोधपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने पासपोर्ट अधिनियम (Passport Act) के तहत नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल आपराधिक मामला लंबित (Pending Criminal Case) होने के आधार पर पासपोर्ट अधिकारियों को किसी व्यक्ति के पासपोर्ट के नवीनीकरण (Renewal) से इनकार करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट का रुख: “ट्रायल कोर्ट की एनओसी अनिवार्य नहीं”
जस्टिस फर्जंद अली की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पासपोर्ट अधिकारी आवेदकों को ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) से अनुमति (NOC) लाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, जब तक कि उस अदालत द्वारा व्यक्ति की विदेश यात्रा या पासपोर्ट रखने पर कोई स्पष्ट कानूनी रोक न लगाई गई हो।
क्या है पूरा मामला?
अदालत के सामने यह मुद्दा तब आया जब पासपोर्ट अधिकारियों ने एक आवेदक का पासपोर्ट रिन्यू करने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था। अधिकारियों का तर्क था कि पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f) के तहत, यदि किसी के खिलाफ मामला चल रहा है, तो उसे पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
- मौलिक अधिकार: कोर्ट ने दोहराया कि पासपोर्ट रखना और विदेश यात्रा करना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
- कानून की व्याख्या: जस्टिस अली ने कहा कि अधिनियम की धारा 6(2)(f) का मतलब यह नहीं है कि हर लंबित मामले में पासपोर्ट रोक दिया जाए। यदि किसी सक्षम अदालत ने आवेदक को पासपोर्ट रखने से नहीं रोका है, तो पासपोर्ट अथॉरिटी खुद से यह पाबंदी नहीं लगा सकती।
- प्रशासनिक सीमा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट अधिकारियों को ‘अर्ध-न्यायिक’ शक्तियां नहीं दी गई हैं कि वे बिना किसी ठोस न्यायिक आदेश के किसी के अधिकार छीन लें।
आम नागरिकों के लिए राहत
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले से उन हजारों लोगों को राहत मिलेगी जिनके पासपोर्ट आवेदन मामूली या लंबित आपराधिक मामलों की वजह से सालों तक पासपोर्ट दफ्तरों में फंसे रहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जब तक कोई व्यक्ति दोषी सिद्ध न हो जाए या कोर्ट उस पर रोक न लगाए, उसका पासपोर्ट रिन्यू किया जाना चाहिए।
