नई दिल्ली | पुणे के चर्चित पोर्श कार दुर्घटना मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आज अभिभावकों की जिम्मेदारी पर बेहद कड़ी और तल्ख टिप्पणी की। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन बच्चों के माता-पिता को दोषी ठहराया जाना चाहिए, जिनका अपने बच्चों पर कोई नियंत्रण नहीं है।
”जश्न मासूमों की जान लेकर नहीं होना चाहिए”
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा, “अमीर परिवारों में समस्या यह है कि माता-पिता के पास बच्चों के साथ बिताने के लिए समय नहीं है। इसका विकल्प वे पैसा और एटीएम कार्ड को बनाते हैं। बच्चे मोबाइल फोन के साथ अकेले रह जाते हैं और फिर ऐसी घटनाएं होती हैं।”
कोर्ट ने ‘नशे में जश्न’ मनाने की संस्कृति पर प्रहार करते हुए कहा कि खुशी मनाने का आधार नशा नहीं होना चाहिए। तेज़ रफ़्तार में गाड़ी चलाकर सड़क पर सो रहे या चल रहे निर्दोष लोगों को मार देना कोई जश्न नहीं है।
”आजादी बनाम साजिश”
यह मामला पुणे पोर्श हादसे के बाद सबूतों को मिटाने और खून के नमूनों (Blood Samples) को बदलने की साजिश से जुड़ा था। कोर्ट ने साजिश के आरोपी तीन व्यक्तियों—आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़—को जमानत दे दी।
जमानत देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हमारे पास इस मामले में कहने के लिए बहुत कुछ है। दो मासूम जानें चली गईं और फिर उन्हें छिपाने के लिए इतनी सारी साजिशें रची गईं। लेकिन आरोपियों के पक्ष में केवल एक बात है कि वे 18 महीने से जेल में हैं। अंततः यह ‘व्यक्तिगत आजादी बनाम अपराध की गंभीरता’ का मामला बन जाता है।”
कानूनी दांव-पेच और सामाजिक चिंता
पीड़ित पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि ऐसे मामलों में एक तय पैटर्न बन गया है—”किसी गरीब ड्राइवर को फंसा दो, खून के नमूने बदल दो और कहो कि हम गाड़ी नहीं चला रहे थे।” इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सहमति जताते हुए कहा कि कानून को ऐसे लोगों को सख्ती से पकड़ना होगा।
मुख्य बिंदु:
- बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां।
- मुद्दा: पुणे पोर्श हादसा (ब्लड सैंपल बदलने की साजिश)।
- फैसला: तीन आरोपियों को मिली जमानत, लेकिन कोर्ट ने पैरेंटिंग पर उठाए गंभीर सवाल।
- टिप्पणी: माता-पिता बच्चों को ‘एटीएम’ की तरह पैसा देते हैं, जो हादसों की जड़ है।
यह आदेश न केवल कानूनी बल्कि एक सामाजिक संदेश भी है कि बच्चों की बेलगाम आजादी के लिए कानूनी रूप से माता-पिता की जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
