फर्रुखाबाद। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले से न्याय की एक बड़ी मिसाल सामने आई है। यहाँ की एक अदालत ने 8 साल पुराने मामले में कानून हाथ में लेने वाले एक दरोगा और सिपाही को कड़ी सजा सुनाई है। कोतवाली में युवकों को बंधक बनाकर पीटने, अमानवीय व्यवहार करने और लूटपाट के दोषी पाए जाने पर कोर्ट ने दोनों को 10-10 साल के कारावास की सजा सुनाई है।
क्या है पूरा मामला?
मामला करीब 8 साल पुराना है। पीड़ित शैलेंद्र कुमार, जो वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं, अपने पड़ोसियों से हुए विवाद की शिकायत लेकर फतेहगढ़ कोतवाली पहुंचे थे। न्याय की गुहार लगाने गए शैलेंद्र और उनके साथ आए दो अन्य युवकों को तत्कालीन दरोगा और सिपाही ने न सिर्फ हवालात में डाल दिया, बल्कि पूरी रात उन्हें बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा।
पीड़ितों का आरोप था कि पुलिसवालों ने उनके साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं। मारपीट के साथ-साथ उनकी चोटी काट दी गई और उनके पास मौजूद सामान व नकदी भी लूट ली गई।
कोर्ट का कड़ा रुख और जुर्माना
एंटी डकैती विशेष न्यायाधीश शैलेंद्र सचान ने इस मामले में दोनों पुलिसकर्मियों को दोषी करार देते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
- सजा: दोनों दोषियों को 10-10 साल की कठोर जेल।
- जुर्माना: प्रत्येक दोषी पर 61-61 हजार रुपये का आर्थिक दंड।
- मुआवजा: जुर्माने की राशि से 40-40 हजार रुपये तीनों पीड़ितों को बतौर मुआवजा देने का आदेश।
- अतिरिक्त सजा: जुर्माना न भरने की स्थिति में 6 माह की अतिरिक्त जेल।
सजा के बाद भी नहीं दिखा पछतावा
हैरान करने वाली बात यह रही कि सजा सुनाए जाने के बाद भी दोषियों के चेहरे पर कानून का कोई खौफ या अपने किए का पछतावा नजर नहीं आया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोनों पुलिसकर्मी कोर्ट से बाहर निकलते समय ‘टशन’ में दिखे। यहाँ तक कि पुलिस ने अपने ही साथियों को हथकड़ी तक नहीं पहनाई और उन्हें खुले हाथ ही जेल ले जाया गया, जो खाकी के रसूख और भाई-भतीजावाद पर सवाल खड़े करता है।
”देर है पर अंधेर नहीं” – पीड़ित वकील
वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे पीड़ित शैलेंद्र ने फैसले पर संतोष व्यक्त किया है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “भले ही न्याय मिलने में 8 साल लग गए, लेकिन मैं कोर्ट की कार्रवाई से संतुष्ट हूं। कोर्ट ने आरोपियों को संबंधित धाराओं में अधिकतम सजा दी है, जो वर्दी की आड़ में अपराध करने वालों के लिए एक कड़ा संदेश है।”
इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह रसूखदार पुलिसकर्मी ही क्यों न हो।
ब्यूरो रिपोर्ट
