प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभियुक्तों के कानूनी अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी आपराधिक अपील को महज इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि अभियुक्त का वकील अदालत में मौजूद नहीं था। जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में अदालत का यह कर्तव्य है कि वह अभियुक्त की सहायता के लिए ‘एमिकस क्यूरी’ (अदालत का मित्र) नियुक्त करे और मामले का फैसला गुण-दोष के आधार पर करे।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गोरखपुर के संजय यादव से जुड़ा है। संजय यादव को मई 2022 में चेक बाउंस (NI Act की धारा 138) के एक मामले में दोषी करार दिया गया था। इस सजा के खिलाफ उन्होंने सत्र न्यायालय में अपील दायर की। हालांकि, अक्टूबर 2023 में जब अपील पर सुनवाई होनी थी, तो उनके वकील उपस्थित नहीं हो सके। सत्र न्यायालय ने वकील की अनुपस्थिति के आधार पर अपील को ‘डिफ़ॉल्ट’ में खारिज कर दिया।
इसके बाद जब अभियुक्त ने दोबारा अपील की और देरी के लिए माफी मांगी, तो उसे भी खारिज कर दिया गया। अंततः न्याय की गुहार लेकर अभियुक्त ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने सत्र न्यायालय के फैसले को कानून के खिलाफ बताते हुए कहा:
- धारा 425 का उल्लंघन: अधिवक्ता की अनुपस्थिति में अपील खारिज करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 425 (जो पूर्ववर्ती CrPC की धारा 384 के समान है) के प्रावधानों के विपरीत है।
- सुप्रीम कोर्ट का हवाला: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘के. मुरुगानंदम बनाम राज्य’ मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि वकील नहीं आता है, तो कोर्ट को एमिकस क्यूरी नियुक्त करना चाहिए, न कि अपील को बंद कर देना चाहिए।
- प्रक्रियात्मक चूक: कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियुक्त को दूसरी अपील करने की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि पहली अपील समय पर दाखिल की गई थी और उसे केवल गुण-दोष के आधार पर ही निपटाया जाना चाहिए था।
कोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसके जरिए अपील खारिज की गई थी। अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि वह इस अपील को बहाल करे और जल्द से जल्द मामले की सुनवाई कर मेरिट के आधार पर फैसला सुनाए।
यह फैसला उन हजारों वादियों के लिए बड़ी राहत है जिनकी अपीलें वकीलों की व्यस्तता या अनुपस्थिति के कारण तकनीकी आधार पर खारिज हो जाती हैं। यह आदेश ‘न्याय के अधिकार’ को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
