महराजगंज। महराजगंज की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट / सिविल जज (प्रवर खण्ड), त्वरित न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया की देरी और मानवीय करुणा के दुर्लभ संगम को दर्शाते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने वर्ष 1995 के एक आपराधिक मामले में, जो केवल ₹275/- की लूट से संबंधित था, वृद्ध अभियुक्त ब्रम्हानन्द को दोषी ठहराने के बावजूद, सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत पर ‘परिवीक्षा’ का लाभ प्रदान किया है।
जुर्म स्वीकारोक्ति और दोषसिद्धि
यह मामला दंडवाद संख्या-1564/1995 से जुड़ा है, जिसमें अभियुक्त ब्रम्हानन्द पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-392 (लूट) और धारा-411 (चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करना) के गंभीर आरोप थे।
मुकदमे की लंबी कार्यवाही के बाद, अभियुक्त ब्रम्हानन्द ने स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर मामले का त्वरित निस्तारण करने हेतु जुर्म स्वीकारोक्ति का प्रार्थनापत्र दिया। न्यायालय ने जुर्म स्वीकारने के संभावित परिणामों (दण्ड) के संबंध में उन्हें विधिवत चेतावनी दी। अभियुक्त द्वारा स्वेच्छया और दृढ़ता से अपराध स्वीकार करने के बाद, न्यायालय ने उन्हें दोनों धाराओं के तहत दोषसिद्ध किया। इस मामले के एक अन्य फरार अभियुक्त वंशी के विरुद्ध कार्यवाही को पृथक कर दिया गया।
दण्ड के प्रश्न पर न्यायपालिका का प्रगतिशील दृष्टिकोण
दण्ड के निर्धारण के चरण में, जहाँ अभियोजन अधिकारी ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधिकतम सजा की मांग की, वहीं अभियुक्त पक्ष ने अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, की धारा-4 के तहत रिहाई की प्रार्थना की।
न्यायालय ने पत्रावली में उपलब्ध तथ्यों और अभियुक्त की परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। न्यायालय के निर्णय को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित थे:
- अत्यधिक विलंब: यह प्रकरण लगभग तीन दशक पुराना है।
- मामले की लघुता: लूट की कुल राशि मात्र ₹275/- थी।
- अभियुक्त की पृष्ठभूमि: अभियुक्त का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास प्रमाणित नहीं हो सका।
- मानवीय स्थिति: अभियुक्त ब्रम्हानन्द वर्तमान में अत्यन्त वृद्ध और अस्वस्थ हैं।
- न्यायिक निष्क्रियता: इस लंबी अवधि में अभियोजन पक्ष कोई भी साक्षी परीक्षित नहीं करा सका।
इन बिन्दुओं पर विचार करते हुए, न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि वृद्ध अभियुक्त को कारावास की कठोरता के बजाय सुधारात्मक अवसर प्रदान किया जाना न्यायसंगत होगा ताकि वह समाज में शांतिमय जीवन व्यतीत कर सके।

