
देश की सर्वोच्च अदालत ने अग्रिम ज़मानत मामलों को लेकर देशभर के हाई कोर्ट्स को एक अहम नसीहत जारी की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी से पूर्व सुरक्षा (अग्रिम ज़मानत) प्रदान करने के लिए हाई कोर्ट्स को कौन से नियम अनिवार्य रूप से मानने होंगे।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख़्त दिशा-निर्देश दिए।
मुख्य बिंदु: आरोपी पहले सत्र न्यायालय जाए
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि अग्रिम ज़मानत के लिए किसी भी आरोपी को सबसे पहले सत्र न्यायालय (Sessions Court/निचली अदालत) का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि:
पहले निचली अदालत: अग्रिम ज़मानत के नियम राज्य में लागू हैं, इसलिए किसी भी आरोपी को पहले प्री-अरेस्ट बेल के लिए सत्र न्यायालय जाना चाहिए।
एफआईआर रद्द न करने पर बेल नहीं: हाई कोर्ट्स के लिए यह पूरी तरह से ‘अस्वीकार्य और नामंज़ूर’ है कि वे किसी आपराधिक रिट याचिका में एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दें, लेकिन साथ ही आरोपी को गिरफ्तारी से सुरक्षा (प्री-अरेस्ट बेल) भी प्रदान कर दें।
जाँच पर पड़ता है बुरा असर
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से मना करने के बावजूद, आरोपियों को चार्जशीट फ़ाइल होने तक गिरफ्तारी से पूरी सुरक्षा देना जाँच प्रक्रिया पर बहुत बुरा असर डालता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्देश के पीछे न तो कोई तर्क होता है और न ही कोई वजह।
खंडपीठ ने अपने पुराने और महत्वपूर्ण फ़ैसले, निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र राज्य सरकार का भी ज़िक्र किया। इस नज़ीर में साफ़ कहा गया था कि हाई कोर्ट किसी भी रद्द करने की याचिका को ख़ारिज करते समय या उसका निपटारा करते समय यह आदेश नहीं दे सकता कि जाँच पूरी होने तक या चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपी की गिरफ्तारी न की जाए या कोई सख़्त कदम न उठाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक ऐसे ही आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस हाई कोर्ट भेज दिया है, और निर्देश दिया है कि हाई कोर्ट चार महीने के भीतर इस मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर पूरी कर फ़ैसला सुनाए। हालांकि, कोर्ट ने हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी होने तक आरोपी को मिली अंतरिम सुरक्षा जारी रखने का भी निर्देश दिया है।
