महराजगंज: गुंडा एक्ट के मामले में 6 महीने से फैसला सुरक्षित, ‘सेटिंग’ के आरोपों के बीच कोर्ट ट्रांसफर की मांग

महराजगंज | ब्यूरो रिपोर्ट

​जनपद में न्याय के मंदिर से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न्यायिक देरी और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला थाना कोठीभार से जुड़े शातिर अपराधी संतोष वर्मा के विरुद्ध चल रही ‘गुंडा एक्ट’ की कार्यवाही का है, जिसमें सुनवाई पूरी होने के 6 महीने बाद भी फैसला न आने पर अब डीएम की चौखट पर गुहार लगाई गई है।

​जिलाधिकारी ने मांगा जवाब

​पीड़ित की गंभीर शिकायतों का संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी न्यायालय ने संबंधित न्यायालय (अपर जिलाधिकारी, वित्त एवं राजस्व) से इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। प्रशासन यह जानने की कोशिश कर रहा है कि आखिर बहस पूरी होने और पत्रावली सुरक्षित होने के इतने महीनों बाद भी आदेश पारित क्यों नहीं किया गया।

​आरोपी का “काला इतिहास”: 23 मुकदमों की लंबी फेहरिस्त

​इस मामले के केंद्र में विपक्षी संतोष वर्मा है, जिसका आपराधिक इतिहास चौंकाने वाला है। रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपी पर 2016 से लेकर 2024 तक कुल 23 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • संगीन अपराध: मारपीट, जानलेवा हमला (324, 325,452 IPC) और लूट (392 IPC)।
  • सामाज के गरीब कमजोर वर्गों के खिलाफ अपराध: SC/ST एक्ट के तहत कई मामले (वर्ष 2017, 2021 और 2022 में दर्ज)।
  • गुंडागर्दी: गुंडा नियंत्रण अधिनियम और 110-G के तहत बार-बार कार्यवाही।

​इतना लंबा आपराधिक इतिहास होने के बावजूद आरोपी का खुला घूमना और न्यायिक प्रक्रिया में देरी होना, क्षेत्र की शांति व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

​क्या है पूरा मामला?

​जिलाधिकारी महराजगंज को एक ‘स्थानांतरण प्रार्थना पत्र’ सौंपा है। प्रार्थना पत्र के मुताबिक, वाद संख्या D202305470000849/2023 में 13 अगस्त 2025 को ही अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी। विधिक सिद्धांतों के अनुसार निर्णय त्वरित सुनाया जाना चाहिए था, लेकिन 6 महीने बाद भी फाइल ‘रिजर्व’ है।

​गंभीर आरोप: “सेटिंग” का दावा

​शिकायतकर्ता का आरोप है कि विपक्षी संतोष वर्मा खुलेआम प्रशासनिक तंत्र में ‘सेटिंग’ होने और निर्णय को प्रभावित करने का दावा कर रहा है। पीड़ित पक्ष ने आशंका जताई है कि पीठासीन अधिकारी के कार्यालय या निकटस्थ माध्यमों से अनुचित संपर्क साधकर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है।

​”जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड”

​प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि अपराधियों पर अंकुश लगाने में प्रशासनिक सुस्ती अपराध को बढ़ावा देने के समान है। पीड़ित पक्ष ने मांग की है कि इस केस को तत्काल किसी अन्य निष्पक्ष और कर्मठ अधिकारी के पास स्थानांतरित किया जाए ताकि न्याय की शुचिता बनी रहे।

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