प्रयागराज | विशेष संवाददाता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालतों में मुकदमों की सुस्त रफ्तार पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभियुक्त की ‘डिस्चार्ज अर्जी’ (आरोप मुक्त करने की याचिका) खारिज हो जाती है, तो ट्रायल कोर्ट को बिना किसी देरी के आरोप (Charges) तय करने चाहिए।
’ऊपरी अदालत में मामला लंबित’ होना बहाना नहीं
जस्टिस चवन प्रकाश की पीठ ने उत्तर प्रदेश की सभी ट्रायल अदालतों को निर्देश देते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कार्यवाही नहीं रोकी जा सकती कि डिस्चार्ज अर्जी खारिज होने के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण (Revision) या अपील दायर की गई है। कोर्ट ने कहा, “जब तक उच्च अदालत द्वारा कार्यवाही पर स्पष्ट रूप से स्थगन (Stay) आदेश न दिया जाए, तब तक ट्रायल कोर्ट आरोप तय करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।”
क्या था मामला?
यह आदेश अवनीश चंद्र श्रीवास्तव नामक एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए आया। श्रीवास्तव पर 2004 में जालसाजी और गबन (IPC की धारा 409, 420, 467 आदि) के गंभीर आरोप लगे थे। कौशांबी की अदालत ने उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी थी, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
- सीमित क्षेत्राधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिस्चार्ज के स्तर पर मजिस्ट्रेट केवल पुलिस रिपोर्ट और दस्तावेजों को देखता है। अभियुक्त का अपना बचाव या उसके द्वारा प्रस्तुत निजी दस्तावेज इस चरण में विचार योग्य नहीं होते।
- संदेह ही काफी है: आरोप तय करने के लिए यह देखना जरूरी नहीं कि साक्ष्य सजा दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं। यदि अभियुक्त के खिलाफ ‘मजबूत संदेह’ (Strong Suspicion) है, तो मुकदमा चलना चाहिए।
- विभागीय जांच का तर्क खारिज: अभियुक्त ने तर्क दिया था कि उसे विभागीय जांच में निर्दोष पाया गया है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के 17 साल बाद आई ऐसी रिपोर्ट को शुरुआती चरण में आधार नहीं बनाया जा सकता।
प्रदेश भर की अदालतों को सर्कुलर जारी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि ट्रायल कोर्ट अक्सर डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के बाद महीनों तक आरोप तय नहीं करते। इस आदेश की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि इस फैसले की प्रति प्रदेश की सभी जिला अदालतों में भेजी जाए ताकि मुकदमों के निस्तारण में तेजी आए।
ब्यूरो रिपोर्ट, विधि समाचार
