महराजगंज: 23 मुकदमों वाले ‘दागी’ पर मेहरबान प्रशासन? 6 महीने से फाइल दबाकर बैठे अफसर, डीएम तक पहुंचा मामला

महराजगंज | विशेष संवाददाता

​जनपद महराजगंज में अपराधियों के मनोबल और प्रशासनिक सुस्ती का एक ऐसा गठजोड़ सामने आया है जिसने न्यायिक व्यवस्था की शुचिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोठीभार थाना क्षेत्र के कुख्यात अपराधी संतोष वर्मा के खिलाफ चल रहे गुंडा एक्ट मामले में पिछले 6 महीनों से फैसला नहीं सुनाया गया है, जबकि अंतिम बहस काफी समय पहले पूरी हो चुकी है।

अपराध का ‘सेंचुरी’ की ओर कदम: 23 मुकदमों का लंबा इतिहास

​जिलाधिकारी को सौंपी गई आरोपी की ‘क्रिमिनल हिस्ट्री’ की फाइल ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। आरोपी संतोष वर्मा का रिकॉर्ड किसी पेशेवर अपराधी जैसा है:

  • संगीन धाराएं: आरोपी पर 2016 से लेकर 2024 तक लगातार मुकदमे दर्ज हैं। इसमें मारपीट,धारादार हथियार से हमला (324) ,धमकी (506), घर में घुसकर हमला (452) और लूट (392) जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।
  • निर्बल वर्गों का उत्पीड़न: संतोष वर्मा पर दलितों और समाज के कमजोर वर्गों को प्रताड़ित करने के करीब आधा दर्जन मामले (SC/ST Act) दर्ज हैं।
  • अभ्यस्त अपराधी: आरोपी पर 2019 और 2022 में भी गुंडा एक्ट की कार्यवाही हुई, लेकिन वह लगातार अपराध की घटनाओं को अंजाम दे रहा है। वर्ष 2024 में भी उस पर नई कानूनी धाराओं (BNS) के तहत केस दर्ज हुए हैं।

न्यायालय में ‘सेटिंग’ की चर्चा, पीड़ित पक्ष में दहशत

​प्रशासनिक न्याय प्रणाली पर सवाल उठाते हुए पीड़ित पक्ष ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर गहरी चिंता व्यक्त की है। आरोप है कि अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के न्यायालय में 13 अगस्त 2025 को ही बहस पूरी होने के बाद पत्रावली निर्णय हेतु सुरक्षित (Reserved) कर ली गई थी।

​शिकायतकर्ता के अनुसार, फैसला सुनाने में हो रही इस अस्वाभाविक देरी का फायदा उठाकर आरोपी खुलेआम प्रशासनिक तंत्र में अपनी ‘पैठ’ और ‘साठ-गांठ’ का दावा कर रहा है। आरोप है कि वह न्यायिक निर्णय को प्रभावित करने के लिए अनुचित हथकंडे अपना रहा है।

मामला ट्रांसफर करने की मांग: “निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल”

​सुरक्षा कारणों और निष्पक्ष न्याय की उम्मीद में पीड़ित पक्ष ने मांग की है कि:

  1. ​इस संवेदनशील पत्रावली को वर्तमान न्यायालय से वापस मंगाकर किसी अन्य निष्पक्ष और सख्त अधिकारी के सुपुर्द किया जाए।
  2. ​एक निश्चित समय सीमा के भीतर कड़ा निर्णय पारित कर क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम की जाए।

​इस मामले में अब सबकी नजरें जिलाधिकारी के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या 23 मुकदमों वाला अपराधी सिस्टम की ढिलाई का फायदा उठाएगा, या प्रशासन ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चलते हुए न्याय सुनिश्चित करेगा?

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