आरक्षण के अधिकारों पर भारी नहीं पड़ेंगी कागजी समय सीमाएं, दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

विशेष संवाददाता

​दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आरक्षण का उद्देश्य किसी तकनीकी बाधा या प्रमाण पत्र जमा करने की सख्त समय सीमा के कारण विफल नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि ‘हाइपर-टेक्निकल’ (अति-तकनीकी) आपत्तियां किसी मेधावी उम्मीदवार के संवैधानिक हक को नहीं छीन सकतीं।

​क्या है पूरा मामला?

​यह मामला एम्स (AIIMS) में फार्मासिस्ट के पद पर भर्ती से जुड़ा है। प्रवीण नामक एक उम्मीदवार ने ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) श्रेणी में परीक्षा दी और सूची में पहला स्थान (First Rank) हासिल किया। भर्ती की शर्तों के अनुसार, ओबीसी प्रमाण पत्र 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2023 के बीच जारी होना चाहिए था।

​प्रवीण के पास 2015 का पुराना प्रमाण पत्र था, जिसे उन्होंने 21 अप्रैल 2023 को रिन्यू करवाया। साथ ही, उन्होंने एसडीएम कार्यालय से एक पत्र भी जमा किया जिसमें पुष्टि की गई कि वह संबंधित वित्तीय वर्ष में नॉन-क्रीमी लेयर में ही आते थे। हालांकि, एम्स ने प्रमाण पत्र की तारीख तकनीकी रूप से सही न होने के कारण उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी थी।

​अदालत की तीखी टिप्पणी

​जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने कैट (CAT) के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें प्रवीण की नियुक्ति का निर्देश दिया गया था। अदालत ने एम्स की याचिका को खारिज करते हुए कहा:

“प्रमाण पत्र जमा करने की समय सीमा को लेकर एम्स की जिद आरक्षण के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है। जब उम्मीदवार ने अपनी योग्यता और श्रेणी (OBC-NCL) को साबित कर दिया है, तो केवल कागजी देरी के आधार पर उसे नौकरी से वंचित करना गलत है।”

 

​फैसले के मुख्य बिंदु:

  1. योग्यता सर्वोपरि: कोर्ट ने माना कि यदि उम्मीदवार वास्तव में उस श्रेणी का हकदार है, तो प्रमाण पत्र जारी होने में हुई प्रशासनिक देरी को आधार बनाकर उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
  2. प्रशासनिक देरी: अदालत ने गौर किया कि दस्तावेजों के सत्यापन में देरी स्वयं प्रशासन की ओर से हुई थी, जिसके लिए उम्मीदवार को सजा नहीं दी जा सकती।
  3. आरक्षण का उद्देश्य: कोर्ट ने याद दिलाया कि आरक्षण का उद्देश्य पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना है, न कि उन्हें तकनीकी नियमों के जाल में फंसाना।

​क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

​कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों छात्रों और नौकरी चाहने वालों के लिए राहत की खबर है जो अक्सर सरकारी दफ्तरों की लेटलतीफी के कारण समय पर प्रमाण पत्र नहीं बनवा पाते। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि नियम न्याय के लिए होते हैं, न कि न्याय को रोकने के लिए।

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