कानूनी इतिहास में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने अदालत को गुमराह करने के लिए एक याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना लगाया है। मामला तकनीक के दुरुपयोग से जुड़ा है, जहाँ वकील द्वारा बहस के दौरान ऐसे अदालती फैसलों (Case Laws) का हवाला दिया गया जो असल में अस्तित्व में ही नहीं थे। जांच में पता चला कि ये फर्जी केस लॉ ChatGPT जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल द्वारा तैयार किए गए थे।
पूरी रिपोर्ट: ‘एआई की समझदारी, वकील पर भारी’
आज की डिजिटल दुनिया में जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को इंसान का सबसे बड़ा मददगार माना जा रहा है, वहीं न्यायपालिका में इसके गलत इस्तेमाल ने खतरे की घंटी बजा दी है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश किए गए साइटेशन पूरी तरह से फर्जी थे।
जब कोर्ट ने इन फैसलों की प्रामाणिकता की जांच की, तो सामने आया कि ये ‘काल्पनिक’ केस कानून एआई चैटबॉट द्वारा तैयार किए गए थे। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ और अदालत के समय की बर्बादी माना।
अदालत की सख्त टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि:
”तकनीक का इस्तेमाल अनुसंधान के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग अदालती रिकॉर्ड को दूषित करने या फर्जी तथ्य पेश करने के लिए कतई नहीं किया जा सकता। वकीलों की जिम्मेदारी है कि वे कोर्ट में पेश किए जाने वाले हर एक शब्द की सत्यता की जांच करें।”
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए कुछ पुराने फैसलों का जिक्र किया था। विपक्षी दल और कोर्ट के मास्टर ने जब उन वॉल्यूम और पेज नंबरों को खंगाला, तो वहां उन नामों का कोई केस नहीं मिला। पूछताछ करने पर स्वीकार किया गया कि ये रेफरेंस एआई की मदद से लिए गए थे, जिन्हें बिना क्रॉस-चेक किए सीधे शामिल कर लिया गया।
कार्रवाई:
अदालत ने इस लापरवाही और धोखाधड़ी के प्रयास के लिए याचिकाकर्ता पर जुर्माना ठोक दिया है। साथ ही, कानूनी बिरादरी को चेतावनी दी है कि भविष्य में इस तरह की ‘तकनीकी भूल’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विशेषज्ञों की राय:
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन सभी के लिए एक सबक है जो बिना सोचे-समझे एआई पर निर्भर हो रहे हैं। ‘हैलुसिनेशन’ – यानी एआई द्वारा आत्मविश्वास के साथ गलत जानकारी देना – अब कानूनी गलियारों में एक गंभीर चुनौती बन गया है।
