‘चयनात्मक कार्रवाई से कमजोर होता है कानून का राज’: यूपी गैंगस्टर एक्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

प्रयागराज | विशेष संवाददाता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ‘गैंगस्टर एक्ट’ के इस्तेमाल और इसकी जांच प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार और गृह विभाग को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि जांच और अभियोजन ‘चयनात्मक’ (Selective) होता है, तो इससे न केवल कानून के शासन (Rule of Law) की नींव हिलती है, बल्कि शासन व्यवस्था पर से आम जनता का भरोसा भी खत्म होने लगता है।

​मुख्य न्यायाधीश की बेंच की अहम टिप्पणियां

​न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने एक प्राथमिकी (FIR) रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के तहत की जा रही कार्रवाइयों पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि प्रशासन अक्सर छोटे अपराधियों पर तो सख्ती दिखाता है, लेकिन संगठित अपराध करने वाले बड़े सिंडिकेट और प्रभावशाली लोग कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं।

कोर्ट की मुख्य बातें:

  1. चयनात्मक अभियोजन: अदालत ने कहा कि कानून की नजर में हर नागरिक समान है। अगर पुलिस और प्रशासन केवल चुन-चुनकर लोगों पर कार्रवाई करते हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
  2. कमिश्नरेट प्रणाली में खामियां: हाईकोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि जिन जिलों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू है, वहां ‘गैंग चार्ट’ को मंजूरी देने में जिलाधिकारी (DM) की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है। कोर्ट ने इसे ‘यूपी गैंगस्टर नियमावली, 2021’ के नियम 5(3)(a) का उल्लंघन बताया।
  3. प्रभावशाली अपराधियों को ‘छूट’?: न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की कि बड़े और संगठित अपराधी जमानत की शर्तों का खुलेआम उल्लंघन करते हैं और अदालतों में तारीख पर तारीख (स्थगन) लेते हैं, जबकि सरकारी वकील उन्हें प्रभावी ढंग से चुनौती देने में विफल रहते हैं।

​प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल

​अदालत ने गृह विभाग को आगाह करते हुए कहा कि प्रशासकों को यह समझना चाहिए कि उनके निर्णय केवल वर्तमान ही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का भविष्य भी तय करते हैं। “इतिहास इन निर्णयों को न केवल दर्ज करता है, बल्कि उन्हें दोहराता भी है,” न्यायमूर्ति दिवाकर ने चेतावनी दी।

​कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य सरकार ने गैंगस्टर मामलों के त्वरित निस्तारण या गवाहों की सुरक्षा के लिए अब तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई है। पुलिस की जवाबदेही केवल कागजी विभागीय जांचों तक सीमित रह गई है, जो अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों पर ही गिरती है।

​क्या है पूरा मामला?

​यह टिप्पणी उस मामले में आई जहां आरोपी ने गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज FIR को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि अधिनियम की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन किए बिना और बिना किसी ठोस आधार के उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने दलील दी कि राज्यपाल की अधिसूचना के तहत पुलिस आयुक्तों को जिलाधिकारी के अधिकार दिए गए हैं, लेकिन कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि फिर गैर-कमिश्नरेट जिलों में संयुक्त निगरानी की व्यवस्था क्यों रखी गई है?

निष्कर्ष:

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘गैंगस्टर एक्ट’ जैसे सख्त कानून का इस्तेमाल अपराधियों को सबक सिखाने के लिए होना चाहिए, न कि प्रशासनिक मनमानी या चयनात्मक कार्रवाई के हथियार के रूप में।

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