सुप्रीम कोर्ट ने देश के बहुचर्चित डीएचएफएल (DHFL) घोटाले के मुख्य आरोपियों, कपिल वधावन और धीरज वधावन को बड़ी राहत देते हुए नियमित जमानत दे दी है। ₹34,000 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘जमानत ही नियम है और जेल एक अपवाद’, और इस सिद्धांत से पीछे हटना संवैधानिक रूप से संदिग्ध है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “प्रक्रिया को सजा न बनाएं”
जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें वधावन बंधुओं की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“भारतीय कानून की आत्मा में यह बात बसी है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, आरोपी को निर्दोष माना जाएगा। किसी विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि वह समाज के लिए खतरा न हो या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना न हो।”
अदालत ने आगे जोड़ा कि ट्रायल पूरा होने में अभी भी 2 से 3 साल का समय लग सकता है। ऐसे में आरोपियों को जेल में रखना उनके अनुच्छेद 21 (त्वरित सुनवाई का अधिकार) का उल्लंघन होगा।
क्या है पूरा मामला?
सीबीआई (CBI) के अनुसार, दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (DHFL) के पूर्व सीएमडी कपिल वधावन और उनके भाई धीरज वधावन ने 17 बैंकों के कंसोर्टियम (जिसका नेतृत्व यूनियन बैंक ऑफ इंडिया कर रहा था) के साथ धोखाधड़ी की। आरोप है कि शेल कंपनियों के जरिए ₹34,615 करोड़ के फंड की हेराफेरी की गई। इस मामले में सीबीआई ने 110 आरोपियों और 736 गवाहों की सूची तैयार की है, जिसके कारण ट्रायल की गति काफी धीमी है।
इन शर्तों पर मिली जमानत
कोर्ट ने वधावन बंधुओं को रिहा करने के लिए कड़ी शर्तें भी लागू की हैं:
- निजी मुचलका: दोनों भाइयों को 10-10 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही राशि की दो जमानतें जमा करनी होंगी।
- पासपोर्ट: आरोपियों को अपने पासपोर्ट सरेंडर करने होंगे और बिना अनुमति विदेश यात्रा पर रोक रहेगी।
- हाजिरी: उन्हें हर महीने संबंधित पुलिस स्टेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
- गवाहों पर दबाव: वे किसी भी तरह से जांच या गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेंगे।
न्यायशास्त्र का बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में वी. सेंथिल बालाजी मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि PMLA जैसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल के अनुचित समय तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता। यह फैसला आर्थिक अपराधों के मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
ब्यूरो रिपोर्ट, लीगल अपडेट्स
