उच्चतम न्यायालय ने पासपोर्ट नवीनीकरण को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि संबंधित ट्रायल कोर्ट ने पासपोर्ट रिन्यू करने की अनुमति दे दी है, तो पासपोर्ट अधिकारी केवल आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर आवेदन को खारिज नहीं कर सकते।
मुख्य बिंदु: अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पासपोर्ट अधिनियम के तहत अधिकारियों को यह अधिकार नहीं है कि वे निचली अदालत के आदेश की अनदेखी करें।
अदालत के फैसले के प्रमुख अंश इस प्रकार हैं:
- अधिकार क्षेत्र का स्पष्टीकरण: यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला चल रहा है और वह ट्रायल कोर्ट से विदेश जाने या पासपोर्ट रिन्यू कराने की अनुमति प्राप्त कर लेता है, तो पासपोर्ट कार्यालय उस अनुमति को स्वीकार करने के लिए बाध्य है।
- पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f): आमतौर पर पासपोर्ट अधिकारी इस धारा का हवाला देते हुए आवेदन रोक देते हैं, जिसमें आपराधिक कार्यवाही लंबित होने पर पासपोर्ट जारी न करने का प्रावधान है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि न्यायिक आदेश मौजूद है, तो प्रशासनिक अधिकारी उसे ओवरराइड नहीं कर सकते।
- मौलिक अधिकार: न्यायालय ने पुनः दोहराया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसे केवल उचित और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही प्रतिबंधित किया जा सकता है।
क्या था मामला?
यह मामला एक याचिकाकर्ता से जुड़ा था जिसका पासपोर्ट रिन्यूअल आवेदन केवल इसलिए लंबित रखा गया था क्योंकि उसके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि संबंधित ट्रायल कोर्ट ने उसे पहले ही पासपोर्ट नवीनीकरण की अनुमति दे दी थी, इसके बावजूद पासपोर्ट सेवा केंद्र द्वारा देरी की जा रही थी।
इस फैसले का प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन हजारों लोगों को राहत मिलेगी जो छोटे-मोटे या लंबे समय से चल रहे अदालती मामलों के कारण अंतरराष्ट्रीय यात्रा या काम के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। अब, यदि किसी आरोपी के पास अदालत की हरी झंडी है, तो पासपोर्ट विभाग को तय समय सीमा के भीतर पासपोर्ट जारी करना होगा।
