माता-पिता को पैसे भेजना या पत्नी से खर्च का हिसाब मांगना ‘क्रूरता’ नहीं,सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न का FIR किया रद्द

विधि संवाददाता

​सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और दहेज उत्पीड़न के मामलों में एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपने माता-पिता को आर्थिक सहायता देता है या अपनी पत्नी से घरेलू खर्चों का विवरण मांगता है, तो इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता।

​जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन के सामान्य ‘उतार-चढ़ाव’ को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

​मुख्य बिंदु: कोर्ट ने क्या कहा?

​अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि:

  1. वित्तीय सहायता: पति द्वारा अपने माता-पिता या भाई-बहनों को पैसे भेजना उसका पारिवारिक दायित्व हो सकता है, इसे पत्नी के प्रति क्रूरता या दहेज की मांग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
  2. खर्चों का हिसाब: पत्नी से एक्सेल शीट (Excel Sheet) में घरेलू खर्चों का हिसाब रखने के लिए कहना, अनुशासन का हिस्सा हो सकता है लेकिन यह धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
  3. सामान्य टूट-फूट: गर्भावस्था के दौरान कथित लापरवाही या प्रसव के बाद वजन को लेकर दिए गए तानों को कोर्ट ने ‘शादी की सामान्य टूट-फूट’ (Normal wear and tear of marriage) करार दिया।

​मामला क्या था?

​यह मामला एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर जोड़े से जुड़ा है जिनकी शादी 2016 में हुई थी और वे अमेरिका में रह रहे थे। 2019 में विवाद के बाद पत्नी भारत लौट आई। जब पति ने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए कानूनी नोटिस भेजा, तो उसके कुछ समय बाद पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और क्रूरता की एफआईआर दर्ज करा दी।

​आपराधिक कानून का दुरुपयोग चिंताजनक

​फैसला सुनाते हुए जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि आपराधिक कानून को निजी प्रतिशोध या व्यक्तिगत विवाद निपटाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप ‘अस्पष्ट और सामान्य’ प्रकृति के थे। 1 करोड़ रुपये की दहेज की मांग के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

​कानून की स्पष्टता

​सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 498ए के तहत मामला चलाने के लिए विशिष्ट घटनाओं और ठोस तथ्यों का होना अनिवार्य है। केवल सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे की अग्निपरीक्षा से गुजारना न्यायसंगत नहीं है।

​इस फैसले के साथ ही शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।

निष्कर्ष: यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहाँ घरेलू वित्तीय प्रबंधन या व्यक्तिगत मतभेदों को आधार बनाकर गंभीर आपराधिक धाराएं लगा दी जाती हैं।

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