
उत्तर प्रदेश के जिला बार एसोसिएशनों के चुनाव पर नियंत्रण को लेकर चल रहे विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) या स्टेट बार काउंसिल को जिला बार एसोसिएशनों के चुनावों को विनियमित या नियंत्रित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें यूपी स्टेट बार काउंसिल द्वारा जारी एक निर्देश को चुनौती दी गई थी। इस निर्देश के तहत राज्य भर के सभी बार एसोसिएशनों के चुनावों पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी। यह रोक BCI के आदेशों पर लगाई गई थी, जिसका उद्देश्य स्टेट बार काउंसिल के चुनावों के साथ टकराव से बचना था।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ:
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में पाया कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 7(g) और 48-B के तहत BCI को स्टेट बार काउंसिल पर सामान्य पर्यवेक्षण का अधिकार है, लेकिन यह शक्ति स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे जिला बार एसोसिएशनों के चुनावी कार्यक्रम को नियंत्रित करने तक नहीं फैलती।
खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि जिला बार एसोसिएशन के चुनाव उनके अपने उपनियमों द्वारा शासित होते हैं। कोर्ट ने कहा, “स्टेट बार काउंसिल के पास किसी भी कानून या नियम के तहत ऐसा कोई अधिकार नहीं है, जिससे वे बार एसोसिएशन के चुनाव को विनियमित या नियंत्रित कर सकें।”
रोक हटी, 10 दिन का अंतर अनिवार्य:
याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने चुनावों पर लगी रोक को तत्काल प्रभाव से हटा दिया। कोर्ट ने सभी संबंधित बार एसोसिएशनों को उनके उपनियमों के अनुसार चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दी है।
हालांकि, चुनावी कार्यक्रमों के टकराव की आशंका को दूर करने के लिए, खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि चुनाव कार्यक्रम की अधिसूचना जारी करते समय यह सुनिश्चित किया जाए कि यूपी बार काउंसिल के चुनाव और बार एसोसिएशन के चुनाव के बीच कम से कम दस दिन का अंतर अनिवार्य रूप से रखा जाए।
