
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत अभियोजन वापस लेने के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी विशेष मामले में अभियोजन वापस लेने की राज्य सरकार की मात्र “इच्छा या मंशा” न तो न्यायालय पर बाध्यकारी है और न ही यह पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (PP) और न्यायपालिका द्वारा की जाने वाली स्वतंत्र जांच की वैधानिक आवश्यकता को कमजोर कर सकती है।
जस्टिस शेखर कुमार यादव की खंडपीठ ने धोखेबाजी और SC/ST एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में चार अभियुक्तों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मुख्य बिंदु: पीपी का स्वतंत्र विवेक आवश्यक
कोर्ट ने रेखांकित किया कि धारा 321 के तहत अभियोजन तभी वापस लिया जा सकता है जब पब्लिक प्रॉसिक्यूटर स्वतंत्र रूप से और सद्भाव में कार्य करता हो। पीपी केवल सरकार के निर्देशों पर कार्रवाई नहीं कर सकता।
- लोक हित सर्वोपरि: कोर्ट ने कहा कि न्यायालय का यह सुनिश्चित करना कर्तव्य है कि अभियोजन की वापसी “लोक हित” में हो, न कि “आरोपी को बचाने” का प्रयास हो।
- न्यायिक हस्तक्षेप: हाईकोर्ट ने स्पेशल जज, SC/ST एक्ट, कुशीनगर के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के अभियोजन वापसी के आवेदन को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि मामले में धोखाधड़ी और जाति-आधारित अपमान के गंभीर आरोप शामिल थे, और पीपी के आवेदन में स्वतंत्र विवेक का प्रयोग परिलक्षित नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन वापसी एक न्यायिक कार्य है जिसके लिए पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त होकर कार्य करना होगा, और न्यायालय को यह सुनिश्चित करने के लिए अपना स्वतंत्र विवेक लागू करना होगा कि यह कार्रवाई सार्वजनिक न्याय के हित में है।
