
महराजगंज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हत्या और साक्ष्य मिटाने (धारा 302/34, 201 आईपीसी) के मामले में दोषी ठहराए गए थाना कोठीभार के विशाेखोर निवासी राजेश पांडेय को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनकी सज़ा को आपराधिक अपील के लंबित रहने तक तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है और उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा-I की खंडपीठ ने क्रिमिनल अपील संख्या 1735/2024 पर सुनवाई करते हुए दिया।
कोर्ट के निर्णय का मुख्य आधार
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि बड़ी संख्या में लंबित अपीलों (प्रतिदिन 100 से अधिक सूचीबद्ध) के कारण इस मामले की सुनवाई निकट भविष्य में होने की दूरस्थ संभावना है। उच्च न्यायालय ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा कि मानव रूप से इतनी अपीलों का गुण-दोष के आधार पर फैसला करना संभव नहीं है। कोर्ट ने इसी आधार पर अपीलकर्ता को जमानत दे दी।
क्या था मामला?
यह मामला साल 2001 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 7 फरवरी 2001 को तड़के करीब 3 बजे मृतका प्रेमशिला (राजेश पांडेय की भाभी)का शव सड़क के किनारे मिला था। हालांकि, मृतका के भाई, त्रिभुवन पांडेय, ने दाह संस्कार के एक दिन बाद 8 फरवरी 2001 को एफआईआर दर्ज कराते हुए राजेश पांडेय और अन्य सह-आरोपियों पर हत्या का आरोप लगाया था।
अपीलकर्ता की दलीलें
राजेश पांडेय के वकील ने जमानत के लिए निम्नलिखित प्रमुख दलीलें पेश कीं:
- परिस्थितिजन्य साक्ष्य: यह मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और किसी भी चश्मदीद गवाह को अदालत में पेश नहीं किया गया।
- दुर्घटना का सिद्धांत: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृत्यु किसी अज्ञात वाहन से हुए हादसे के कारण लगी चोटों से हुई थी।
- गवाह का विरोधाभास: मृतका के भाई (PW-1) ने खुद स्वीकार किया था कि उन्हें पुलिस से दुर्घटना की जानकारी मिली थी और उन्होंने एफआईआर दाह संस्कार के बाद दर्ज कराई थी।
- आपराधिक इतिहास: अपीलकर्ता 31 जनवरी 2024 से जेल में है, मुकदमे के दौरान जमानत पर था, और उसका कोई अन्य आपराधिक इतिहास नहीं है।
रिहाई की आवश्यक शर्तें
राजेश पांडेय को निम्नलिखित कठोर शर्तों के अधीन रिहा किया जाएगा:
- मुचलके: उन्हें संबंधित न्यायालय की संतुष्टि के लिए व्यक्तिगत मुचलका और दो ज़मानतें प्रस्तुत करनी होंगी।
- जुर्माना: अपीलकर्ता को रिहाई के एक महीने के भीतर जुर्माने की राशि का 50% जमा करना होगा। शेष 50% राशि अपील लंबित रहने तक स्थगित रहेगी।
- संपत्ति: उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना वह अपनी अचल संपत्ति को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकते।
- पते का परिवर्तन: पते में बदलाव होने पर 10 दिनों के भीतर न्यायालय को सूचित करना अनिवार्य होगा।
